#काव्योत्सव२ #आध्यात्म
मै ख़ुश हूं या मदहोश हूं,
ऐ आइने बता दे मुझे।
इनायत कर मुझ पे सच बताना,
ख़ुदा का वास्ता है तुझे।
गैरत मेरी रुखसत तो नहीं हुई,
या ईमान तो मेरा सलामत है।
रहमो करम तो मुझमें जिंदा है,
तफ़्तीश कर बता क्या हालत है।
मालूमियत तुझमें है,
हसरत है तेरी अरसे से।
तू परखेगा सही एकदम,
मजबूर है तू पेशे से।
मै इंसा हूं या हूं वहशी,
ऐ आइने बता दे मुझे।
भरोसा है मुझे थोड़ा,
तेरी नज़रों के धोखे पर।
गला घुट भी जाता है
अच्छाई का भी मौके पर।
अजब उस्ताद होते हैं
पुराने वक्त के क़िस्से।
तजुर्बा तेरे हिस्से है
तमाशा है मेरे हिस्से।
तू देदे मुझे ईनाम,
मेरी उलफत का।
रहूंगा मैं एहसान मंद,
तेरी जहमत का।
मै जिंदा हूं या मुर्दा हूं,
ऐ आइने बता मुझे।