#KAVYOTSAV -2
#KAVYOTSAV_2
#कविता #देर
कितना समय बीत गया
यह समय आने में,
कितने कल कल हो गए
इस आज को पाने में,
लक्ष्य अब भी वहीं पड़ा,
तू भले यहीं खड़ा है,
राही का मान नहीं
यूँ बैठकर रोने में,
बहुत देर है अभी
बहुत देर होने में।
अब भी पुल बाँध सकता है,
अब भी धरती सींच सकता है,
अपने कर्म से हथेलियों में
भाग्य रेखा खींच सकता है
किसी का भविष्य तो सुधरेगा
तेरे अब भी बीज बोने में
बहुत देर है अभी,
बहुत देर होने में।
कभी सोचा कर लेंगे,
कभी सोचा क्या करना,
अब चिंगारी उठी भी,
तो आँखों से बहाये झरना,
मन यूँ बोझल न कर
पिछली भूल ढोने में,
बहुत देर है अभी
बहुत देर होने में।
पहले अपने रुष्ट किए,
आलस का साथ निभाकर,
फिर सपने भी नष्ट किए,
सपनों को स्वप्न दिखाकर,
कोई बुराई तो नहीं थी,
बस थोड़ा और सोने में,
कोई भलाई भी नहीं अब
जागकर क्षण भी खोने में
इतनी देर भी नहीं
बहुत देर होने में...
#प्रेरित
#प्रेरित