?अंधभक्ति ?
कैसे आए खाने को
जब पिता ना जाए कमाने को
छोड़ कर्म को धर्म की राह पर चला ।
अंधभक्ति ने एक घर यूं ही तबाह किया ।
घर गृहस्ती को छोड़कर, पत्थरों को मनाने चला।
अपनी जिम्मेदारियों से मुख मोड़ कर, ईश्वर को पाने चला।
मिला ना ईश्वर एक पल कहीं।
सुख चैन भी सब हो चला ।
तिल तिल कर दिन बीत गए।
बिन शादी बेटा बेटी रह गये ।
अंधभक्ति ने ऐसा डाला डेरा ।
तबाह हुई घर गृहस्ती रह गया अकेला।
जब करनी थी संगत साधु की
तो ना करनी थी तुमको शादी ।
जब थी इच्छा साधु बन ईश्वर को पाने की
तो ना करनी थी गृहस्थ जीवन की तैयारी ।
✍एक बेटी की कलम से ✍