ऐसा भी होता है न कभी कभी
जब आसमाँ गाता है और
धरती झूमती है
टिकते ही नहीं पाँव जमी में
मानो हवा में उड़े जा रहे हैं
मुस्कान ऐसे चिपक जाती है आकर
कि मुँह दुख जाता है
वैसे कितनी प्यारी है तुम्हारी भी
मुस्कान
तुम्हारे चेहरे पर जब खिलती है
तो लगता है कि सूर्य की किरणें
अंधेरों को चीर कर चमकने लगी हो
और जगमगा गया हो पूरा आलम
कहीं कण मात्र भी अंधेरा नहीं
जैसे मुखर होने लगे हो भाव धरती के
और मौन होके झुक गया हो आसमाँ
या धरती कुछ उठने लगी हो
धड़कने कितनी तेज धड़कने लगी
मानो सीने से निकल कर सामने आकर बैठ गई हो
और नजरो ने नजर झुका कर धड़कनों की
हर बात मान ली हो
सोचती हूँ
क्यों हम अपनी खुशियाँ भूल जाते हैं
क्यों हम जी नहीं पाते
क्या सपनों को साकार करना अपराध है
समझ नहीं आता
असमंजस में हूँ
seema aseem