मजदूर दिवस विशेष लेख
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बनावटी दुनिया
आज की बनावाटी दुनिया जिसमे सभी लोग मतलब के लिये जीते है, यहाँ पर आज ऊँची ऊँची गगन चुंबी इमारते तो है साथ ही उतनी ही नीचे गहराइयों मे अपना जीवन व्यतीत करता हुआ गरीब भी है l यहाँ सुपरफास्ट हवा से भी तेज बुलेट ट्रेन तो है साथ ही रेंगती हुई गरीबों की जिंदगियाँ भी हैl यहाँ पर चकाचौंध करने वाली रोशनी तो है साथ ही अंधेरी तंग गलियाँ भी हैं।कहने का अर्थ है कि आलीशान सी रंगारंग दुनिया तो हम देखते है देखकर खुश भी होते है पर इस दुनिया का भार अपने कंधों पर उठाये उन गरीबों को देखकर भी अनदेखा कर देते है।
कहते है इस दुनिया को ईश्वर ने बनाया है परन्तु जो दुनिया उन्होंने बनाई थी जिस में हरे भरे पेड़,ऊँचे-ऊँचे पहाड़, कल-कल बहती नदियाँ, मधुर-मधुर आवाज करते झरने, ऊपर खुला आसमान और सैकड़ों मीलों तक फैली हरी घास की चादर वह तो अब लगभग नष्ट सी हो गयी है, और अब एक ऐसी दुनिया अपने पैर फैला रही है जो इन मनमोहक चीजों से कोसों दूर है ।जिसमें ऊँची ऊँची गगन चुंबी इमारत, मकड़े के जाल की तरह फैला पटरियों का जाल, कुकुरमुत्ते की तरह जगह जगह मकान और दुकान, शोर करती हुई गाड़ियां और फैक्टरियाँ है जो कि बिल्कुल भी मनमोहक नहीं है।और इस दुनिया को ईश्वर ने नहीं गरीब (मजदूर) ने अपना हाथ लगाकर बनाया है।कोई भी निर्माण बिना किसी मजदूर के संभव नहीं है परन्तु इन मजदूरों की दशा यह है कि उनके पास रहने को घर नहीं है, खाने को सिर्फ सूखी रोटी, उनके बच्चों को शिक्षा नहीं मिलती, उनके पास सिर्फ किसी फुटपाथ का कोना या कोई खंडहर ही होता है।
तो आप स्वयं ही सोचिये कि यह दुनिया आखिरकार बनावटी हैकि नहीं ? जिसने इसे बनाया उसे ही इसने खुद से अलग रखा है।