स्वर्ग-नर्क
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मोहन – आज तो कोठे पर जा कर मुजरा देखने का मन है. होटल जा कर कुछ तडकता फड़कता खा कर मनोरंजन करते हैं| सोहन तू भी चलेगा ना?
सोहन - अरे नहीं यार, मुझे तो कीर्तन पर जाने का बड़ा मन है, तू भी मेरे साथ चल मोहन.
मोहन – तू बड़ा धार्मिक हो गया है आज-कल, मुझे नहीं आना, तू जा अपने रस्ते, में अपने रस्ते चला.
“दोनों दोस्त अब अपने अपने मन मर्ज़ी अनुसार जा चुके”,
मोहन कोठे पर नाच-गान देखते हुए सोचता है की, में कितना बड़ा पापी हूँ, एक दोस्त नें मुझे अच्छी जगह ले जाने की बात कही और में यहाँ कोठे पर बैठ कर शराब पिता हुआ मुजरा देख रहा हूँ, और मेरा दोस्त आध्यात्म गंगा में मस्त हो कर पुण्य कमा रहा होगा. वहां का मंज़र कितना सुहावना होगा.
वहीँ दूसरी और सोहन सोचता है की, में भरी जवानी में यहाँ भजन कीर्तन में फसा पड़ा हूँ और मेरा दोस्त मोहन वहां जिंदगी के मज़े लुट रहा होगा. वहां नाचने वाली कितनी सुंदर होगी और ऊपर से मदिरा-पान का मज़ा.
इस तरह दोनों मन ही मन एक दुसरे के स्थान के ध्यान में लीन हो जाते हैं. तभी उस शहर में भयानक तूफ़ान आता है और दोनों दोस्त मारे जाते हैं.
मौत के बाद...
मोहन स्वर्ग में था, और सोहन नर्क में था. वह दोनों इस बात से आश्चर्यचकित थे की, उन दोनों की विरुद्ध गति कैसे हुई. इस सवाल का जवाब हासिल करने के लिए दोनों यमराज के पास गए.
मोहन – मै तो कोठे पर बेठ कर मुजरा देख रहा था, फिर भी मुझे पाप लगने के वजाए यहाँ स्वर्ग में स्थान कैसे मिला.
सोहन – मेरे साथ तो खुला अन्याय हुआ है, मै तो भगवान् के कीर्तन में बैठा था, वहां दुर्घटना-वश मेरी मौत हुई, मेरा तो मोक्ष पर अधिकार होना चाहिए, और आप नें मुझे नर्क में क्यूँ भेज दिया?
यमराज – मोहन तुम्हारा कृत्य अवश्य पापयुक्त था लेकिन तुम्हारा मन उस अवस्थामें था ही नहीं, तुम्हारा मन तो कोठे पर बैठे हुए शराब पीते हुए भी भगवान् की भक्ति में ही था, इसी कारण तुम पाप मुक्त अवस्था में मरे और स्वर्ग-गति पा गए.
सोहन तुम्हारी सोच अच्छी थी, तुम भगवान के दर पर भी आये, लेकिन तुम्हारा मन हर वक्त कोठे पर ही था, तुम यही सोचते रहे की मेरा दोस्त भोग-विलास में डूबा होगा और में यहाँ फ़स गया. इसी कारण तुम्हारी गति ख़राब हुई और तुम को नर्क में जाना पड़ा है.
सारांश – मन में संशय हो तो अच्छा कार्य भी फलहिन् हो जाता है, स्वर्ग-नर्क किसी दंतकथा समान है लेकिन, इस कहानी से सिख मिलती है की, अच्छा कार्य करने के लिए स्थान ज्यादा महत्व नहीं रखता है, भावना पवित्र होना ज़रूरी है| सोच अच्छी होनी ज़रूरी है.