अद्भुत अकल्पनीय रूप, हे! परी हो क्या?
मेरे लिए ही मानवीय तन, धरी हो क्या?
भँवर सजे कपोल मन्द मुस्कुराहटें।
मन को डुबोने वाली रूप गागरी हो क्या?
आवाज़ में खनक झनक उठे है साज सी।
होठों पे धरूँ सांवरी, हे! बांसुरी हो क्या?
अब तो तुम्ही हो सिर्फ मेरा योग-ध्यान सब।
सच सच कहो रचयिता की, जादूगरी हो क्या?
तुमको भला लिखूँ मैं क्या तुम्हीं कहो ज़रा
प्रतिमान रूप का कोई, हे सुंदरी हो क्या?