Quotes by Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan in Bitesapp read free

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan

@pankajkumarmishravatsyayan9090


अद्भुत अकल्पनीय रूप, हे! परी हो क्या?
मेरे लिए ही मानवीय तन, धरी हो क्या?

भँवर सजे कपोल मन्द मुस्कुराहटें।
मन को डुबोने वाली रूप गागरी हो क्या?

आवाज़ में खनक झनक उठे है साज सी।
होठों पे धरूँ सांवरी, हे! बांसुरी हो क्या?

अब तो तुम्ही हो सिर्फ मेरा योग-ध्यान सब।
सच सच कहो रचयिता की, जादूगरी हो क्या?

तुमको भला लिखूँ मैं क्या तुम्हीं कहो ज़रा
प्रतिमान रूप का कोई, हे सुंदरी हो क्या?

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तेरे हुस्न में इक गज़ब ताज़गी है
भरूँ साँस में आस मन में जगी है।


नये काफियों की नई इक बह्र तुम
ग़ज़ल खूबरू जिसमें पाकीज़गी है।


तुम्हें चाँदनी से सजाया गया तो
अमावस को ईश्वर से नाराज़गी है


सिवा तेरे कोई भजन ही न भाये
यहाँ मन पे बस तेरी ही ख्वाजगी है


मेरे हाथ गर थाम कर तुम चलो तो
ये दुनिया मेरी सल्तनत राजगी है

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न पूछो कुछ सियासत का अगर हमसे, तभी बेहतर
वगरना हम कहेंगे मुआमला ये भेड़ियों का है

ज़िद थी उनको चूमने की, चूम आये हम गुलाब।
पाक वो भी रह गये, औ हो न पाये हम ख़राब।।

थी ये ख़्वाहिश रात भर आगोश में उनके रहें।
चाँदनी बिखरी रही, शब भर रहा छत पर शबाब।।

कौन कहता जिस्म का मिलना ही पाना है मियाँ।
कौन मीरा का किशन था, पा गया मैं भी जवाब।।

धड़कनों में उसकी सरगम, उसकी ख़्शबू साँस में।
देखिये चेहरे पे मेरे कैसा उसका है रुआब।।

प्यास थी इक जो महल में ख़त्म होती थी नहीं।
घूमने निकले जो बाहर तो मिटी जाकर जनाब।।

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