मेरी कहानी अद्भुत थी
चारों ओर से पहाड़ों से घिरी थी,
हवा जो चल रही थी
वह भी कुछ गुनगुना रही थी,
जैसे प्यारा के किस्से बुदबुदा रही हो,
या संघर्ष का अध्याय खोली रही हो।
मेरे पास बहुत कुछ नहीं था,
महाभारत का अधूरा ज्ञान था
रामायण की अल्प कथा थी,
थोड़ा आकाश था
थोड़ी धरती थी,
मुट्ठी भर सच-झूठ था।
किसी वृक्ष की छाया में बैठ
मैं बुद्ध भगवान की तरह सोचता
पर अगले ही क्षण तीक्ष्ण भूख
मुझे मथ डालती।
अनुभव लेते-लेते मैं जवान हो गया,
जीवन का अनुभव था,
जीने की तरह मरना भी एक कला है,
धीरे-धीरे मैंने समझा।
प्यार के हाथों ने
जो भी गुणा-भाग किया
मेरी कहानी में जुड़ता गया,
इस बीच नदी ने कभी नहीं कहा
कि उसका सुन्दर वर्णन हो,
पहाड़ ने कभी नहीं कहा
कि उसकी ऊँचाई का बखान हो,
धरती उदार बन
हमारे गुण- दोष देखती रही।
**महेश रौतेला