नारी
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घर की शोभा नारी से ,
अनूपम इसका रूप,
एक क्षण भी रूकती नहीं,
करती परीश्रम खूब,
कोमल सी काया इसकी,
अन्नपूर्णिना सा रूप,
आठों पहर श्रम करने पर भी,
बदले नहीं स्वरूप,
कष्ट हजारों सह कर भी,
रहती हर दिन चुप,
इसलिए नारी कहलाती,
शक्ति का ही स्वरुप
Uma vaishnav
(मौलिक और स्वरचित)