रह के सरहद पे हिफ़ाजतो के लिए,
खून भी दे देते हैं इस मिट्टी के लिए।
ये जवान हैं हमारे कौम ना पूछ इनसे,
ये हँस के मर जाते है वतन के लिए।
गुनाह कोई नहीं बस वर्दी में तैयार थे,
वतन के खातिर ये जाँ निसार थे।
जिन्हें टुकड़ों में घर भेजा गया तिरंगे में,
वो भी तो जिंदगी के हकदार थे।
वहां चौखट पर राह तकती बूढ़ी माँ,
पता भी नहीं उसे बेटा तिरंगे में आए।
उस मासूम से बच्चे से जरा पूछ,
जिसका बाप घर तो आया, मगर नहीं आया...