कुछ बेशकीमती चीज़े बस्ते में भर कर उसे बेचने में सुबज शाम निकल जाता हूं।।
शहर शहर बस्ती बस्ती में फुर्सड को बेच आता हूं।।
भर के सांसो को गुब्बारों में,में हवा बेच आता हूं।।
देकर पत्थरो को नाम में "भगवान" बेच आता हूं।।
कुछ कागज़ के टुकड़े कमाने में खुद का इमान बेच आता हूं।।
भर ने पेट में परिवार का,जिस्म को सरेआम बेच आता हूं।।
सुकून से सोऊंगा आशियानों में एक दिन ,सोच कर यु अपना चेनो-आराम बेच आता हूं।।
मलहम पट्टी या लगा लगा कर वो अपने टूटे फूटे अरमान बेच आता हूं।।
आखिर में अपना वजूद बेच के भी शाम को खाली हाथ में घर को लौट आता हूं।।
में खाली हाथ ही क्यों लौट आता हूं?
~ANV~