लीख कविता
घूमु इधर उधर
कभी उनसे पुछु कभी उनसे
पर कोई न ढंगका उत्तर दे
एक ने थोडा ढंग का कहा ऐसी नहीं ऐसी होती है कविता
पर फीर भी ढंगका उत्तर न लगा
सखी बोली चल ओर एक है जो बतादे
दिखाई कविता लीखा था नाम उसमें मेरा
नाम काट नया लीख दिया
सोचा बहोत अच्छे
थोडा बुरा लगा नाम काटा
में भोली क्या जानुं
जानने को कर रहे
पहली नजर मुजे देख प्यार जो हुआ था
दुसरी कविता लीख दीखाई
तभी आंखें मीली और प्यार हो गया
पर अनजानी क्या जाने
उसका दिल तो ढुंढ रहा था चहुं ओर
मीले मुजसा तो बतादुं दिल का हाल
सालों से जो दबी आवाज थी
पर साल बीता
एक दिन अचानक
दिवाली की मुबारकबाद देने जा पहोंचा दिल
पुछा आप क्या पढते हो
डर के मारे कदम लड खडा कर चल दिए
बार बार चहेरा सामने आता रहा
पर फिर कहीं भूलक्कड दिमाग भूला देता
फिर क्या था
एक दिन सखीओ संग खडी थी
देख मुझे सखी संग देखने लगे
बहोत बुरा लगा
एक साल बाद फिर कविता में
लीख दिल का हाल हाजमे थमा दिया
पर फिर भी दिल को पता मील गया महेबुब
पर पगली को न मालुम सामने ही है महेबुब
कई दिनों तक कोशिश रही
लोगो से मिल याद दिलाने को
एक दिन अचानक
कक्षामे पढाया जा रहा
पर दिल-दिमाग लड रहे है
फूट फूट रोई
और पता चला यही है जीसकी तलाश थी
केहने लगी जब कि
सोच में तो था कुछ ओर नीकला कुछ ओर
तब शिष्य की बात सुन गुरु का भी फैसला बदला
उनकी सोच में बसा था दुजा
नीकल आया दुजा
और जोडी जम गई
प्यार की गाडी पटरी पर चल पडी
पर भूल गए तो भूल अए ना
पर न जाने तो फिर रुठे
माहोल ऐसा था कि प्यार मतलब की न जाने क्या ?
पर कुछ न हुआ
सब संभला ही था कि
फिर नया आया
न जाने
न आवाज उठाए
बस विश्वास करें
कैसे ?
समझने को लग पडे
ओर फिर क्या था
सवाल पे सवाल
तो जवाब भी मीलते चले गए...ॐD