सोचती थी जीवन साथी कैसा होगा ?
ख्वाबों की दुनिया होगी ,सपनो का जहां होगा
सुनहरे दिन व सपनीली रातों का वक़्त मेहरबाँ होगा
पर जल्द ही सेहरे में सजा वो चेहरा ,
जिंदगी की धूप छांव में सामने आया
न ही गुलाबों के बगीचे में मेरा दामन लहराया
वक़्त और जिंदगी की तालमेल में हमने खुद को बिठाया
कभी झगड़ के रोये तो कभी तुमने हंसाया
इस बीच हमारे पद और ओहदे बदल गए
नन्ही किलकारियों ने हमें माँ बाप का रूप दिलाया
बदलते रहे खुशियों के मायने
वक़्त ने कुछ यूं जिम्मेदारियों का पाठ पढ़ाया ..
हां तुम्हारी दवाइयों से मेरी बिवाइयों तक
हमें एक दूजे का सम्बल बनाया ..
सच कहूंगी आज यूँ लगता है कि , हाथों की दरार
को लेकर नही हुई कभी तकरार
क्या तुम्हें न था पत्नी में प्रेयसी का इंतज़ार ?
क्या तुमने भी
चांद सी प्रेयसी के स्वप्न को भूल
अपना ली जीवन के हर रूप की गर्द औऱ धूल ?
सच यही तो प्रेम है शाश्वत और सत्य
जहां सप्तपदी का आश्रय हो और हो एकत्व ..!
हां वैसे ही हो तुम जीवन साथी मेरे
मेरे जीवनाकाश के स्वर्णिम स्वप्न चितेरे..!
हां तुम ही हो मेरे सच्चे जीवनसाथी
जैसे जलकर भी होते हैं संग ,दिया और बाती..!
-कविता जयन्त