ओ आकाश:
ओ आकाश, थोड़ा खुल जा
मौत के लिए नहीं, जिन्दगी के लिए,
राग द्वेष के लिए नही, प्यार के लिए,
ओ आकाश, थोड़ा और सुन्दर हो जा।
जब निकलूँ अपनी आकांक्षाओं के साथ,
तेरी रचनाओं को पढ़ता जाऊँ,
दुनिया के शुद्ध होते विचार
अपनाते जाऊँ।
मरता हर कोई है अपने शरीर से
पर खुली हवा सबको मिलती रहे,
आत्मसंतुष्टि से मरना महत्वपूर्ण है,
लोग मरते हैं ,देश के लिए, सत्य के लिए,
प्रकाश लाने के लिए, चाहे मुट्ठी भर हो।
आत्मा की खुराक जहाँ भी हो
प्यार में हो,प्रसाद में हो, ज्ञान में हो,
पवित्र स्थान के जिस पत्थर या मिट्टी में हो,
वह सबको सतत मिलती रहे।
ओ प्रकाश, थोड़ा खुल जा
कीड़े-मकोड़े जो आदमी में घुस आये हैं,
उनके बिलों को बंद कर दे,
सुख से दुख को ढक दे।
**महेश रौतेला