उसने कहा, तुम शायर हो ना! मुझपर भी कोई शायरी लिखो।
अब उसे कौन बताए की, उसपे क्या शायरी लिखूँ? वही तो एक चलती-फिरती नज़्म खुदा ने मुझे तोहफे मे दी है।
फिर भी कुछ लिखने की गुस्ताखी कर ली मैने!
अर्ज करता हूँ.....
यूँ अदाकारी से जान ना ले जान-ए-मन,
हम तो पहले से ही तेरे कायल है ।
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सोनल सुनंदा श्रीधर
औरंगाबाद, महाराष्ट्र
धन्यवाद