जब उठता हूँ ,नई उम्मीद के साथ ,
जब बिखरता हूँ, एक विश्वास के कारण ।
गैरो पर करता हूँ, अपनो से कतराता हूँ,
वो मिले तो जी भरके जीलू जिन्दगी ।
अजीब हूँ, किसी की तलब नही मुझे,
फिर भी एक मुस्कान के लिए काम करता हूँ ।
फिर चलता हूँ, गली-गली शहर-शहर,
एक नये आसियाने की तलाश मे ।
खूदार हु या मजबूर मै नही जानता,
जैसा भी हूँ, पर किसी का नहीं ।
ढोल जाता हूँ, किसी के नजर चूराने से
अपने आप को थामे रखता हूँ
बात मेरी नही, विश्वास की है ॥