सोचता हूँ
एक दिन के लिए मर जाऊं,
निम्न स्तर के
इन भाषणों को न सुनूं,
प्रदूषण से निपट लूँ,
झूठी बातों से मुँह मोड़ लूं।
मरकर एक उड़ान भरूं
हिमालय पर मडरा कर
ठंडी हवाओं में ठिठुर लूँ,
जब धूप निकले
अपने अस्तित्व को सेक लूँ।
मरना जब है ही
तो मन की आवोभवा साफ रखूं,
गुणों को धारण कर मरूं।
अंधेरे के लिए सूरज नहीं ला सकता हूँ,
पर एक दीया अवश्य जला सकता हूँ,
बहुत बड़ी संस्कृति नहीं बना सकता हूँ,
पर देश की भाषा लिख-बोल तो सकता हूँ।
सोचता हूँ
एक दिन के लिए मर जाऊं,
दुनिया के चाल-चलन को
प्यार की कुछ लकड़ियां दे दूँ।
***महेश रौतेला