ज्ञान का संधान... ज्ञान का संधान ।
ज्योति की अभ्यर्थना है मन का अनुसंधान।
शब्द की आराधना के गीत हम मन से लिखेंगे
भावना की प्रार्थना से मोल जीवन का करेंगे
आज जो आधार अपने, कल उन्हें आधार देंगे
बन के अपने कल का निर्मल आसमान।
रास्ते उनको मिले हैं जो चले हैं लक्ष्य लेकर
खोज लें हम अर्थ जीवन के यहां एकत्र होकर
हों प्रकाशित परिजनों की सब अपेक्षाएं धरोहर
कर सकें सारे अंधेरों से महा संग्राम।
स्वस्थ मन की अर्चना हो स्वस्थ तन की साधना हो
स्वस्थ जीवन से शिखर संधान।
सांध्य वेला में क्षितिज पर डूबते सूरज से लेना
फ़िर सुबह होने का नव आह्वान।
विषम होते पथ जहां पर ज्ञान की पुरवा न बहती
सौंपती है ज्ञान गंगा लक्ष्य का संधान।
खोजना भवितव्य अपना सीखने की ललक लेकर
रच के कोई कीर्ति आलीशान।
नवकिरण जो उदित होकर झलकती है इस क्षितिज में
एक दिन वो पथ दिखाती ज्योति बन कर विकट तम में
कल यहां गूंजेगा घर घर
विदुषियों के कारवां का गान।
ज्ञान का संधान... ज्ञान का संधान...।