अच्छा सुनो...
एक बात मुझे तुमसे कहनी है....
खामोशी आज सुन लेना।
तुम जो रोज सुबह उठती हो
अंगडाई लिए...
बंद आँखों से तुम्हें देखता हूँ।
बालों को समेट जूड़ा बनाती हो
और कुछ सलवटें साड़ी की हटाती हो।
मैं मुस्कुराता हूँ चादर के नीचे से
तेरी आँखों के काजल को फैला देखकर।
मुझे पता है तुम इंतजार करती हो
मेरे माथे को चुमने का ....लेकिन
रूक जाती हो ताकि मेरी नींद न टूटे।
सुनो.....
मैं खड़ा हो मंदिर के बाहर
तुम्हें देखता हूँ....
गीले बालों को अपने चेहरे पर फैलाए
माथे गहरा टीका और सिंदूर लगाए
तुम ईश्वर मेरी खुशियाँ मांगती हो
पर पगली!क्या तुम्हें नहीं मालूम
मेरी खुशी तो तुम ही हो।
अच्छा तुम्हें पता है ना!
मुझे चाय पीने की आदत है
फिर भी दो कप के बाद मुझसे लड़ती हो
मेरी सेहत का रखकर ख्याल
क्यों इतना डरती हो।
मुझे पता है कि तुम कहती हो मूक आँखों से
कि आओ कुछ मदद तुम्हारी कर दूँ
बच्चों की बॉटल में बस पानी ही भर दूँ
पर मैं बचता हूँ ताकि तुम मुझे खुद बुलाओ
मेरी जरूरत का मुझे एहसास कराओ।
सुनो...
मैं तो अकेले कुछ भी नहीं हूँ
न रंग न गंध और न जमी हूँ
तेरी साँसों में मेरा वजूद घुल गया है
और तेरे लबों का रंग मुझमें मिल गया है।
चाहता ही नहीं मैं खुद कुछ करूँ
बस तेरी आरजू तेरी चाहत में रहूं।
सुनो....
मुझे पता है तुम घबराती हो
मेरे फोन न उठाने से
बिना बताए मेरा ऑफिस से देर से आने से
तेरी घबराहट पर मुझे प्यार आता है।
तेरी बाहों में ही मुझे संसार नजर आता है।
सुनो....
मैं जानता हूँ तुम्हें पलाश पसंद है लेकिन
मैं अक्सर गुलाब ले आता हूँ
क्योंकि नहीं चाहता मेरे सिवा किसी और को
तुम देखो और नजदीक करों।
तेरे हर गुस्से पर मैं झुंझलाता हूँ
क्या करूँ मैं यूँही प्यार जताता हूँ...।।
मैं ...।
दिव्या राकेश शर्मा।