मेरा खत
बिन कलम से लिखे, इक खत को
आज भी दिल के कोरे पन्नें पर
न जाने क्यों सहेजे बैठी हूं!
गर कोई पढ़ लेता तो,
कितना बवाल होता।
कौन है ये ,हर इक नजर का ,
मुझसे सवाल होता।
गर दिल की गिरह खोल देते तो,
ये इश्क बेहिसाब होता।
आज इस चाँद के पास भी,
इक आफताब होता।
मेरे अनकहे प्यार का ,
उनके पास, कोई तो जबाव होता।
इंकार ही सही ऐ दिल सुन लेता!
ना इस तरह से ,मुझे यूँ मलाल होता।
@सीमा शिवहरे 'सुमन'
भोपाल ।