कविता-नयनों के दीप
दीपों के झिलमिलाहट से तुम।
चाँद की जगमगाहट से तुम।
प्रकाशित हो मन आँगन में।
स्मृतियों के मन प्रांगण में।
आँखों में छलक उठते हैं बेशुमार मोती।
तुम ही हो मेरे आशाओं की ज्योति।
यादों का सूरज अब चढ़ने लगा है।
विरह का तपन अब बढ़ने लगा है।
मन के कोने में है अँधियारा घोर।
प्रिय बन कर आओ चमकता भोर।
मन की व्यथा कह लेती तुमसे अशेष।
मलय पवन तुम सुनाना मेरा यह संदेश।
दो नयनों के दीप जल उठते हैं।
गहन तम में आशाओं के दीप जल उठते हैं ।
डॉ. शैल चंद्रा
रावण भाठा, नगरी
जिला- धमतरी
छत्तीसगढ़