गुजराती भाषा में एक कहावत हैः
चा बगड़ी तो सवार बगड़ी, शाक बगडयुं तो दिवस बगड्यो, अथाणुं बगड्युं तो वर्ष बगड्युं, अने बैरूं बगड्युं तो आखी जिंदगी बगड़ी।
अर्थात् चाय बिगड़ी तो सवेरा बिगड़ा, सब्जी बिगड़ी तो दिवस बिगड़ा, अचार बिगड़ा तो पूरा वर्ष बिगड़ा और पत्नी बिगड़ी तो सारी जिंदगी बिगड़ी। यह पुरानी कहावत है।
मैं कहता हूँ कि मेरी एक बात और मिला दो, अगर समझ बिगड़ी तो 84 लाख जन्म बिगड़े और समझदारी नहीं बिगड़ी तो कुछ भी नहीं बिगड़ा।
संत तुकारामजी महाराज की पत्नी उठते भी गाली, बैठते भी गाली देती और कभी-कभी डंडा भी मार देती फिर भी उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा।
संत तुकाराम भगवान विट्ठल से कहते हैं- “मेरे विट्ठला ! तुमारी अपार कृपा है। मैं कितना-कितना वर्णन करूँ ! झगड़ालू पत्नी देकर तो आपने मुझे बचा लिया है। अब दिन रात आपका भजन करने में मन लगता है। अगर पत्नी झगड़ालू नहीं होती तो मैं शायद इतना भक्त भी नहीं बन सकता था।”
संत एकनाथ जी महाराज की पत्नी तो जितनी देखने में देवी थी, उतनी गुणों में भी देवी थी, नम्र थी और पति के अनुकूल रहने वाली महान नारी थी। एकनाथ जी बोलते हैं- “हे विट्ठल ! मेरे अनुकूल पत्नी देकर तुमने मेरे को निश्चिंत कर दिया और निश्चिंत होने के कारण मेरा मन तुममें लगा है, यह तुम्हारी कृपा है।”
संत नरसिंह मेहता की पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। वे कहते हैं- “दो चूड़ियाँ होती हैं तो खटपट होती है, आपने एक चूड़ी को अपने चरणों में बुलाकर मुझे निरंजन नारायण की भक्ति का अवसर दिया है।” ऐसा नहीं कि ‘हाय रे हाय ! अब मेरा क्या होगा ? तेरे बिना भी क्या जीना….’ छाती कूटने नहीं लग गये थे।
परिस्थितियाँ कैसी भी आयें लेकिन आप उऩकी समीक्षा करते हैं या नहीं ? एक होती है प्रतीक्षा दूसरी होती है समीक्षा। प्रतीक्षा अप्राप्त वस्तु की होती है, समीक्षा प्राप्त वस्तु की होती है। ईश्वर की कृपा सदा प्राप्त है और तुम्हारा ईश्वर भी तुम्हारे को सदा प्राप्त है। प्रतीक्षा की कोई जरूरत नहीं है, केवल समीक्षा कीजिये, अपना कल्याण कर लीजिये।