काँटों के चुभने से ही है ,
कष्टों की परख समझ आती |
राहें कितनी यह निरापद हैं ,
चलने पर ही है समझ आती ||
पर देर न मेरे जितनी हो ,
मुड़ने में और परखने में |
फिर लौट सकें न बदल सकें ,
मग में ही बीते जीवन क्षण ||
कलिमल का असर मनुजता पर ,
खग्रास ग्रहण करने वाला |
जियो और जीने दो का , युग है जल्दी जाने वाला ||
पंच तत्व कब्जाने का , संघर्ष शुरू होने वाला |
मानव ही मानव मारेगा , धधकेगी महाप्रलय ज्वाला |||