"तुम्हारी बहन कितनी बेशर्म है ....उसने दुपट्टा भी नही ओढ़ा हुआ हुआ है .....उससे कहो की दुपट्टा ओढ़े और यहाँ रहना है तो ढंग से रहे .....वरना चली जाये .....। "
रमेश ने दीप्ति से कहा । दीप्ति ने मधु को देखा, उसे कुछ
लघुकथा - शर्म - लिहाज़
भी अज़ीब नही लगा , एक तो इतनी गर्मी दूसरा मधु ने ढंग के कपड़े पहने हुए थे , उसे रमेश की मानसिकता पर गुस्सा आया , उसके साथ तक तो ठीक था , लेकिन अब उसकी बहन पर भी अपनी मानसिकता थोपे उसे ये स्वीकार नही था , उसने कुछ सोचा फिर आलमारी की तरफ बढ़ गयी ।
"ये लो .....। "
"ये क्या है .....? "
"तुम्हारे कपड़े टी शर्ट और पाजामा ....पहन लो .....। "
"दिमाग तो ठीक है तुम्हारा ....इतनी गर्मी में बनियान तो पहनी नही जा रही ......पाजामा और टी शर्ट कैसे ....? "
"तुमने बनियान भी नही पहनी है और मधु के सामने बैठे हो .....सिर्फ तुम्हें ही गर्मी नही लगती .....सबको लगती है ......अगर वो दुपट्टा लेगी तो तुम भी पूरे कपड़े पहन कर घर मे रहोगे .....शर्म - लिहाज़ का ठेका खाली हम स्त्रियों ने ही नही लिया है ......। " दीप्ति ने रमेश को दो टूक सुनाया और किचन मे चली गयी ।
क्या आप इस विचार से सहमत है की शर्म लिहाज़ सिर्फ महिलाओं को ही करनी चाहिये । आज़ भी ऐसे बहुत से लोग है जो लड़कियाँ अगर दुपट्टा ना ले तो समझते है की लड़की को शर्म लिहाज़ नही है । ऐसी बात नही की सिर्फ पुरुष ही ऐसा सोचते है , कुछ महिलायें भी ऐसा ही सोचती है । ऐसी महिलायें अपने घर की बहू - बेटियों को दुपट्टा ना लेने पे टोक सकती है लेकिन अपने घर के पुरुष जो निक्कर और बनियान में घूमते है , उन्हें ये नही कह सकती की ' जाओ बनियान के ऊपर शर्ट पहन लो घर में बहू -बेटियां है अच्छा नही लगता ......। '
मेरा मानना है की ऐसी सोच का विरोध होना चाहिये आपका इस बारे में क्या कहना है कमेन्ट कर के प्लीज़ जरूर बताये और मेरे विचार आपको पसंद आते है तो प्लीज़ मुझे फॉलो कर ।
धन्यवाद ।
मौलिक व अप्रकाशित