लकीर के फकीर न बने
10 साल का यश स्कूल से आते ही, मां से लिपट गया ।मां ने कहा- आ गए मेरी आंखों के तारे।
ओह मां तुम क्या आंखें बिछाए बैठी थी, मेरी बाट जोह रही थी।
हां मेरे कलेजे के टुकड़े, तुम्हे आज देर हो गई, तो मेरा कलेजा ही मुंह को आने को था।
यह सुनते ही यश बोला -मां मैं तो फूल कर कुप्पा हो गया।
पर मां ने यश को छुआ, तो उसका जी भर आया ,यह आज आंखें लाल कैसे दुलारे ।तेरा तो माथा भी भट्टी की तरह तप रहा है। अभी तेरी नून राई करती हूं ।
ओहो मां ,आज अध्यापिका जी ने यही पाठ पढ़ाया था, कि अंधविश्वास को जड़ से उखाड़ना है ।हारी बीमारी में सबसे पहले इलाज से बचाव अच्छा ।
अंधविश्वास किसी भी परिस्थिति में करना ,अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। मुझे बुखार है तो तुम मुझे डॉक्टर के पास ले चलो ।अक्ल के पीछे लट्ठ लिए मत फिरो, जंजाल में मत फसो और मुझे गाजर मूली भी मत समझो ।
मां ने कान ऐठते हुए कहा -अच्छा मैं तुझे कलेजे का टुकड़ा कह रही हूं ,मेरी बिल्ली मुझे ही म्याऊ ।
मां मुझे डॉक्टर के पास ले चलो वरना आजकल कई तरह के बुखार फैले हैं। कहीं मुझसे हाथ ना धो बैठे तुम और पिताजी। चल औंधी खोपड़ी के ,ऐसा मत कह मेरा तो कलेजा ही मुंह को आ गया ।तेरे बिन मेरी तो दुनिया ही इधर की उधर हो जाएगी।
तो मुझे डॉक्टर के पास ले चलो स्कूल में अध्यापिका जी ने सिखाया था। आग लगने पर ही कुआ नहीं खोदना चाहिए। तो हाथ पर हाथ धरे मत बैठो मां।
हां मेरे लाल और दोनों कपड़े बदल कर आनन-फानन में डॉक्टर की तरफ निकल पड़े।