इश्क़ ने फिर से मुझे निकम्मा बना दिया,
जो मौसम मै पीछे छोड़ आया था,
उसका फिर से समा बना दिया,
कैसे समझाऊं इस दिल को,
इसने फिर से मुझे निकम्मा बना दिया।
कई दफा रोया था फुट फुट कर,
आज फिर उनसे ही मिला दिया,
बोला था इश्क़ के बवाल में ना पड़वाना,
फिर से उनसे ही टाका भिडवा दिया,
क्या बताऊं इश्क़ ने,
फिर से मुझे निकम्मा बना दिया।
उनकी कोमल सी मुस्कान ने,
फिर वही जादू चला दिया,
सालों पहले जिस पेड़ ने सारे पत्ते गिरा दिए थे,
उनपे फिर से हरियाली लगवा दिया,
क्या बताऊं इश्क़ ने,
फिर से मुझे निकम्मा बना दिया।
इश्क़ एक बला है,
जो कभी ना कभी सबपे चला है,
जो बचा है समझो वो किस्मत वाला है,
बाकी सब तो इसके ही इशारों पर चला है।
© Krishna Katyayan 2018