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दर्द से तो मेरा रिश्ता पुराना है।
बचपन से ही घर आना जाना है।'
इक आदत सी है,साथ जीने की ।
वो दोस्त है,दुश्मन तो ज़माना है।।
मैं भूला ही कहाँ,मैं क़रीबी उसका
मेरी मिज़ाज पुरशी,इक बहाना है
इक आध ज़ख़्म,भर जाये तो क्या
ज़ख़्मों का तिलस्म है ,ख़ज़ाना है ।
'गर हो जाऊँ बदनाम ये मंज़ूर मुझे
थोड़ी जिन्दगी, खुद ही चुराना है ।
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