मैंने नदी से कहा
प्यार करोगी
वह चुप रही, अभी तक चुप है,
कल-कल बहती रही।
मैंने पहाड़ से कहा
प्यार करोगे,
वह गुमसुम रहा
अटल खड़ा, झांकता रहा, आकाश को।
मैंने खेत की फसल से कहा
प्यार करोगी,
वह लहलहाने लगी।
अपने-पराये त्योहारों से पूछा
आत्मीयता दिखाओगे,
वे जगमगाने लगे, टिमटिमाने लगे
हर घर पर ठहर कर नाचने लगे।
मैंने बरखा से कहा
प्यार करोगी
वह शरमाई, ताकती रही
सोच रही है 'न जाने कौन सा षडयंत्र है ये,'
सोच रही है ' नादान सा वाक्य है ये'
और लम्बी चुप्पी लेती देखती रही।
राहों से कहा
प्यार करोगे, वे मूक बने रहे
और मुझे मीलों चलाते रहे,
इस तरह हर क्षण, प्यार एक प्रकाश देता रहा
अनन्त होती जीजिविषा को भगाता रहा।
***महेश रौतेला