मै अपने सुख को थाली के एक छोटे से कोने में रखे उस चटनी के समान समझता हूं जिसको देखकर ही सारा खाना ख़त्म कर देता हूं या कभी मन हुआ तो थोड़ा सा चाट लेता हूं।पूरा थाली भर चटनी ना मिल सकती ना खा सकता।थाली में सौ व्यंजन भले ही पड़ जाए पर चटनी थोड़ी सी ही मिलेगी।इसको बाट के खा लेने वाले भी खूब है दुनिया में पर लाने वाले कम।
-Krishna Katyayan