#kavotsav
अनछुई
तुम्हारे साथ ,
एक छत के नीचे
एक घर में रहते हुए ।
तुम्हारे जीवन के
हर सुख दुख में शरीक होते हुए ।
तुमने स्पर्श किया मेरे तन को
पर कभी कोशिश न की
मन को स्पर्श करने की।
हर दिन यूं ही गुजरता रहा
उम्र मेरी कट गई
मैं अनछुई ही रह गई ।
डॉ अलका अग्रवाल
काश!
काश !तुम समझ पाते
मेरी आ हें
मेरी कराहें ।
अगर तुम संवेदनशील होते
अनुभव करते
मेरे मन की घुटन
मेरा मूक रूदन ।
अगर तुम सहृदय होते
महसूस करते
मेरा सम्मान
मेरा स्वाभिमान ।
अगर तुम मेरे नजदीक होते
पहचान पाते
मेरी अस्मिता
मेरा अस्तित्व ।
पर तुम दूर ही रहे मुझसे
नहीं सुन पाए मेरा चीत्कार
मन का हाहाकार ।
डॉ अलका अग्रवाल
मैं अनछुई ही रह गई ।
डॉ अलका अग्रवाल