#Kavyotsav
भावनाएं
कुछ कविताएं रह जाती है.....
बिन-कही
बिन-लिखी
बिन-सुनी सी कही....
सजाया जाता है,भावनाओं को इनमें
लफ़्ज़ों को जमाना बाक़ी रहता है....
भटकती रहती है ये इस ओऱ से
उस ओऱ तक लगातार....
थमती नहीं कभी
पर थम चुकी कलम से संभली
भी नहीं जाती कभी....
ये मिटती भी हैं,
बनने का अटूट इरादा भी रखतीं हैं...
कविताएं कुछ ऐसी भी होती है...
जो जन्म लेने से पहले ही मर जाती है....दिमाग़ में ही कही..
जो भ्रमण कर सज जाती है माथे पर भी...
जैसे सजती हैं, मणि सर्प पर.....
चमकती भी हैं......ये
आँखों में किसी के एक रोज सितारें की भाँती....
ये आशा-निराशा,कष्ठ, प्रेम,योग,मोह-लोभ,क्रोध सभी सहन करती है.....
ये कुरीतियों से युद्ध व
प्रेम से प्रेम किया करती हैं....
पर,
रह जाती है बाक़ी ,
असल में ये......भी
पन्नों पर उतरती ही नही....
और,
रह जाती हैं,
बिन-कहीँ
बिन-लिखीं
बिन-सुनी सी......कविताएं मेरी....
?