#Kavyotsav
'और भी ज़्यादा'
-मधु शर्मा कटिहा
मैं सीप....चाहत की बूँदों से तेरी मोती बनाने थे,
पिरोकर डोर में रेशम की कुछ रिश्ते सजाने थे,
हुए तुम दूर रहे न मोती....न वो रेशमी धागा,
किया इंतज़ार था करती हूँ अब और भी ज़्यादा।
क्या लम्हें थे जब तुमने मेरे नगमें सुने थे,
जोड़कर सुर्ख़ लफ़्ज़ों को मैंने सपने बुने थे,
कुछ और साथ देते तुम तो रूहानी होकर मैं,
लिखती अल्फ़ाज़ पिघलते हुए और भी ज़्यादा।
फ़ासला कैसा कलम के हो गए करीब तुम,
लिखना था कुछ और मैंने लिख दिया ‘सिर्फ़ तुम’
ख़ुश हूँ मगर इस तरह खोकर भी तुमको मैं,
कि पा लिया तेरा साथ अब और भी ज़्यादा।
कह दिया था सब तुम्हें मैं रुक न सकी थी,
यूँ ही सी.......बहकी चाहत तुमको भी थी,
सर्द आह मेरी बढ़ा न दे तेरी वो गुनगुनी सी चाह,
हो न जाए इश्क़ वाला लव तुम्हें और भी ज़्यादा ।