#Kavyotsav
'तू शायद भूल गई...'
तू शायद भूल गई,
मेरी हर सुबह तेरे चहेरे का नूर देख कर होती थी,
सूरज भी बाद में आता था मेरा,
मेरी सूरज तो तू बनती थी,
तू शायद भूल गई,
जब तक तेरी प्यारी सी ज़प्पी नहीं मिलती थी,
ना मेरा दिन निकलता था,
ना ही मेरी सुबह होती थी,
तू शायद भूल गई,
जब दोपहर को खाना खाने साथमे बैठते थे,
तेरे कोमल हाथो से खाना खाए बिना,
ना ही मेरा मन भरता था, ना ही भूख कम होती थी,
तू शायद भूल गई,
शामको हररोज तुम मुझसे पूछा करती थी,
की तुम्हे खाना खाया की नहीं! और जवाबमें,
में कहेता था, तुम्हारे पेट से ही पुछलो,
तू शायद...भूल गई,
जब देर रात को हम बाते करते थे,
तू अक्सर पूछा करती थी, मुझसे कितना प्यार करते हो?
और में तुमसे कहेता था, अपने आप से ही पूछलो,
तू सब कुछ भूल गई,
वो पहेली बारिश, वो चांद की रात,
बिना पैसे शॉपिंग और वो मनाने वाली डेटिंग,
यूं ही तेरा मु फुलाना और मेरा तुझे प्यार से थप्पड़ लगाना,
बिना बादल बरसात के जैसे वो खुशनुमा हसीन पल,
सच में सब कुछ भूल गई तुम?
पता है जब तूम फिल्म देखते देखते रोने लगती थी तो मेरा शर्ट खराब कर देती थी और जब में पूछता था क्यों रो रही हो?
तो तुम बताती थी,
बस यूं ही, कुछ नहीं,
क्या ये भी भूल गई तुम?
जब कोई ना होता था तेरे साथ,
तब में वही पर तेरे साथ रहेता था,
तुमसे लड़ता था, जगड़ता भी था, लेकिन,
तेरा साथ कभी नहीं छोड़ता था,
क्या ये भी भूल गई तुम?
जब तू रोते रोते मेरे पास आती थी,
काफी खरी खोटी मुझे भी सुना देती थी,
तेरे गुस्से, प्यार और तकलीफ को मैने समझा था,
जब तक तू ठिक नहीं होती थी, मेरी बाहों में ही रहेती थी,
इसे कैसे भूल गई तुम?
तू तो मेरी जिंदगी,
मेरी सांसे, और
मेरा आईना थी,
ऐसे केसे भूल गई तुम?
यूं ही मुझे क्यू छोड़ गई तुम?