#Kavyotsav
बचपन..!
क्या दिन थे वो बचपन के,
जब चाँद हमारे मामा हुआ करते थे |
माँ को लोरी सुनते ही सो जाते थे |
दोस्तों से मिलने घरसे भाग जाते थे |
बारिशों में भीगते मौज करते थे,
पानी में नांव छोड़ ताकतें रहते थे |
स्कूल की दीवारें मंदिर सी लगती थी,
टिफ़िन की रोटी दावत सी लगती थी |
आज लगता है बेकार ही बड़े हो गये,
चंदा मामा हमारे मून हो गये |
अब नींद की गोलियाँ भी रास नहीं आती,
क्या करें कमबख्त आजकल नींद नहीं आती |
दोस्तों से मिलने की वजह ढूंढ़ते हैं,
मिल भी लिये तो भागने का बहाना ढूंढ़ते हैं |
बारिशों में भीगना अब पागल क़रार देती हैं,
कागज़ की वो नांव मुझे ताकती रहती हैं |
ऑफ़िस की दीवारों में घुटन सी होती हैं,
टिफ़िन की रोटी जेल की रोटी सी लगती है |
बचपन से बड़े होने की चाह में,
जिंदगी रफ़्तार से जीने की राह में,
छूट गये कितने लम्हें वो प्यारवाले |
छूट गये वो दोस्त अपना कहनेवाले
अच्छे ही थे वो दिन बचपनवाले,
नहीं देखने हमें ख़्वाब बड़ोवाले |
By Dip