' तुम '
हारु अगर मे कभी तो
उमीद का सवेरा बनना तुम
रुकु अगर तो होसला बनके
मन्जिल तक चलना तुम
समज ना पाउ हलातो को कभी तो
अपनी समज से मुजे समजाना तुम
मेरे मायुसियो की पलो मे
मुस्कुराहट कि वजाह बनना तुम
नाहो कभी बाते लबझो मे बया
तब खामोशी मेरी पढना तुम
ना दिखु अगर पास तेरे तो
मुझे महेसुस करना तुम
- कविता पटेल