पी तुम बसे अकास
मैं कासे लगाऊं आस!
जो तुम होते इस धरती पर
मैं पाती अवकास!
केकरी पूजा तूम हो करते
केकर हो तुम दास!
किस कोने में जा के छुपे हो
कौन है तुमरो खास!
ना निगली ना उगली जाती
गले फँसी एक फांस!
निजात मोहे कब रे मिलेगी
इस हड्डी इस मांस!
कौन निकाले जी को भँवर से
देह के इस आवास!
अपनी प्रेयसी छोड़ गए क्यों
पापी जग के पास!
पूजा पाठ रे मैं ना जानूँ
कासे करूँ अरदास!
ना तोहे ना जग को ही
मैं कोहू न आई रास!
Sadhana Pandey
#kavyotsav
#काव्योत्सव