#kavyotsav
ग़ज़ल (कुछ और)
ज़ख़म अभी भरे नहीं पुराने ,नये कुछ और मिल गए,
छुप छुप कर रोने के बहाने, तुम्हें कुछ और मिल गए।
तुमने तो तलाशा नहीं शिद्दत ए ग़म को कभी,
जब मिले तो थोड़ा और,कुछ और मिल गए।
आरज़ुयें जो पुरानी सभी,कभी पूरी कब हुईं,
जो सीने में जलते अरमां कुछ और मिल गए।
अभी तो आज़माईशों का सिलसिला थमा भी नहीं,
और तुम्हे आज़माने कुछ और मिल गए।
अश्क़ के आबशार जो गोया सूखने लगे,
आंसुओं के नज़राने कुछ और मिल गए।
कुछ नग़मे दिलफ़रोश दिल के बेबस लबों से,
तनहाई में गुनगुने कुछ और मिल गए।
राहों से ग़ुज़रे कभी जो आहिस्ता आहिस्ता,
अजनबी मुसाफ़िर तुम्हे कुछ और मिल गए।
हाए ये जुनुन ख़ुद को मिटाने का बेख़ौफ़! बेहया!
शमा में जलने को परवाने कुछ और मिल गए,।
तुम ख़्वाबों में लगाए आस सारी रात जिन्के,
उन्हे नींदें चुराने कोई और मिल गए।
कौन करता है इंतजार अब मैय-ख़ाने में तेरा,
साक़ी को पिलाने जाम कोई और मिल गए।
शबे वस्ल में बिछाए पलकें उन्के इंतजार में बैठा था 'सादिक़'
हुई सुबह तो जाना उन्हे तो कोई और मिल गए।
©sadique