#KAVYOTSAV
मानव एक रोबोटः
हे मानव,सुना है तुम रोबोट में भावनाएँ भरना चाहते हो।
उसमें अपना प्रतिविम्ब निर्मित करना चाहते हो।
क्यों निरर्थक श्रम करते हो,
मुझे तो तुम अभी भी रोबोट ही नजर आते हो।
इंसान हो, पर लगते हो जैसे चलता-फिरता रोबोट।
भावना रहित मानव बम, जिसमे भरा है मात्र विस्फोटक।
बाहर सब कितना शांत, सौम्य, सजा-सँवरा, उजला।
मगर भीतर अदम्य लालसाओं, अतृप्तियों, स्वार्थों का जलजला।
जब फूट कर बिखरते हो, कितने रिश्ते..कितनी मर्यादायें बहा ले जाते हो।
जब टूट कर बिखरते हो, अकेले..बेसहारा..अवसादित से छितर जाते हो।
तब तुम मुझे रोबोट के करीब..बेहद करीब... नजर आते हो।
हवा हो गई वो संवेदनाऐं जो तब थी, जब तुम जन्में थे।
कितने निश्चल, कितने मासूम से सपनें थे, जो मन में थे।
तब तुम भोले थे, अनगढ थे, अनभिज्ञ थे,पर अप्रतिम भी,
अब तुम विकसित हो, सर्वज्ञाता हो, जटिल हो और कृत्रिम भी।
हे अत्याधुनिक, अतिविकसित, भावनाविहीन मानव!
अब तो मुझे तुम शत-प्रतिशत रोबोट ही नजर आते हो।