स्वार्थ के पर्दे में रिश्ते रो रहे हैं आजकल,
बीज मिट्टी में विषैले बो रहे हैं आजकल।
प्रीत वाली डोर में उलझन कभी सुलझी नहीं,
भार सम्बन्धों का दिल में ढो रहें हैं आजकल।
धन जमा करने यहां हम रात दिन हैं जागते,
मन की आंखें बंद करके सो रहे हैं आजकल।
खूब काला हो गया हैं मन का ये हीरा यहां,
कोयलों की खान में ही धो रहे हैं आजकल।
ये भी चाहा वो भी चाहा पर कहाँ संतोष है,
जो भी पाया है यहाँ अब खो रहे हैं आजकल।
✍? नरेंद्रपाल जैन।
ऋषभदेव जिला उदयपुर (राज.)
मो. 9785205694