#THANKYOUTEACHER
गुरु किस रूप में मिले पता ही नहीं चलता। मुझसे 18 वर्ष छोटी ' शिखा ' की ज़िद ने मुझे माँ सरस्वती से मिलवाया।आत्मा का परमात्मा से मिलन तो एक गुरु ही करवा सकता है। धन्यवाद है गुरु को।
' समर्पण '
••••••••••••••••
एक विद्यालय- प्रांगण मध्य
खुला प्रार्थना स्थल
और उसका मंच
मंच पर आसीन
कला पुंजनी प्रतिमा
माँ- सरस्वती!
सोचा
प्रतिमा तक पहुँचु
चरणों की रज भाल धरूं।
संकोच, शर्म और कुछ
भीड़ ने रोका,
उस पल
तुम्हारा हठ और यूँ मचलना
मुझे खींच कर ले जाना
और
माँ- चरणों से स्पर्श कराना
मेरी हथेलियों का।
मंत्रमुग्ध सी आत्म- विभोर हो
शून्य में जा पहुंची।
लगा
किसी ने छुआ
सिहरन थी, रोमांच था
एक मिलन का एहसास था।
बस
वही एक पल
मेरे सृजन का पुनारम्भ बना।
है तुम्हें समर्पित
यह मेरी कृति।
तुम्ही हो तरणी जो बनी वैतरणी
आत्मा और परमात्मा के मिलन की।
पुनः नमन है तुमको।
नीलिमा कुमार