औरत और नींद
"अपने हसीं पैरों को जमीन पर मत रखिये"-
आदमी ने औरत से नहीं कहा!
लेकिन इतना सुनने भर की चाह लिए औरत भागती रही दफ्तर से घर और घर से दफ्तर!
"चाँद जैसे मुखड़े पर कोई सितारा है तुम्हारी बिंदिया"-औरत ने मन में ऐसे गुना गोया आदमी ने कहा ही हो
और इसी मुगालते में घर को स्याह आसमान सा धो डाला।
"आसमान में यह चाँद नहीं तुम्हारा कंगन है "-किसी लोकल ट्रेन से लटकी औरत ने जाने कहाँ से सुना और हंस दी
हँसी हँसी में दुर्गम सफर भी कटा!
अपने इन्हीं खयालों,मुगालतों और हंसीं सपनों में डूबी औरत;
आधा सोती और आधा जागती
टिफिन में लाई रोटी सब्जी को किसी दिवा फल सा खाती
हाँफती दौड़ती भागती लोकल गाड़ियों में लटक जाती
कंधे पर लटके भारी बैग को जिंदगी सी कसकर थामे चलती!