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*जोकर:मुखौटे के पीछे* बड़ी-सी लाल नाक, गालों पर सफेद चूना, और होंठों पर स्थायी खिंची एक मुस्कान, तालियों की गड़गड़ाहट का वह भूखा सौदागर— आज फिर बाज़ार में अपनी 'बेइज्जती' बेचने निकला है। कितना मज़ाकिया है न यह दृश्य? कि वह गिरता है ताकि तुम खड़े होकर हँस सको, वह पिटता है ताकि तुम्हारे ठहाकों की तिजोरी भर सके, व्यंग्य तो देखिए— दुनिया उसे 'बेवकूफ' समझती है, और वह पूरी दुनिया को 'उल्लू' बना रहा होता है। बाकी कलाकारों के बीच जब भीड़ बढ़ती है, तो 'आशीष' ने भी गौर से देखा उस फनकार को, जो खुद एक लतीफा बन गया है सिर्फ चंद सिक्कों की खनक के वास्ते। पर खेल खत्म होने के बाद— जब लाइटें बुझ जाती हैं और सर्कस का तंबू खाली होता है, तब वह उतारता है अपना 'मखमल का कोट' और पोंछता है चेहरे का वह जिद्दी गाढ़ा रंग। तौलिये पर रंग नहीं, उसकी बरसों की दबी हुई आहें उतर आती हैं। वहाँ कोई दर्शक नहीं होता, पर हवाओं में एक गूँज सुनाई देती है— यह ठहाका नहीं, यह तो 'क्रंदन' है। वह जोकर... अब आइने के सामने बैठकर अपनी ही आँखों से पूछता है: "अगली सुबह फिर हँसाना है उन्हें, बता... आज रात कितना रोने की इजाजत है?" Adv. आशीष जैन 7055301422 फिरोजाबाद
जीवन: एक अधजला पत्र वक़्त की दहकती भट्टी से अभी-अभी झपट कर निकाला गया है इसे, देखो, इसके किनारे अभी भी सियाह हैं, और उनसे सोंधी-सी गंध आ रही है— झूठ के जलने और सच के झुलसने की। यह जीवन... विधाता के दफ़्तर से निकला एक 'अधजला पत्र' ही तो है। पूरा मजमून (विषय) तो कोई पढ़ ही नहीं पाया, कुछ शब्द 'बचपन' की आग में स्वाहा हुए, कुछ 'जवानी' की बेबाक लपटों ने चाट लिए, अब जो बचा है, उसे 'बुढ़ापा' अपनी धुंधली आँखों से पढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहा है। सफेद हिस्सों पर इबारत कम है, काली राख के निशान ज़्यादा हैं, ये निशान गवाह हैं— उन ख़्वाहिशों के, जो अधूरी रह गईं, उन वादों के, जो बीच में ही टूट गए, और उस प्रेम के, जो मुकम्मल होने से पहले ही असमय 'इतिहास' हो गया। अजीब कशमकश है... इस अधजले पत्र को न फेंका जा सकता है, न ही सीने से लगाकर मुकम्मल जिया जा सकता है। बस, सहेज कर रखा है इसे साँसों की अलमारी में, इस उम्मीद में कि शायद... शायद बची हुई कोरी जगह पर अभी कुछ नया, कुछ सार्थक लिखना बाकी है। पर सच तो यही है, हम सब ढो रहे हैं अपने-अपने हिस्से का— एक 'अधजला पत्र'। Adv. आशीष जैन 7055301422 फिरोजाबाद
*अनकहा सच* पॉकेट में पड़े कुछ सिक्कों की खनक-सा नहीं है मेरा सच, न ही वह किसी बड़े मंच पर दिया गया कोई सधा हुआ भाषण है। मेरा सच तो उस 'खालीपन' में है जो भीड़ से घर लौटते समय बस की खिड़की के बाहर दिखता है। वह सच, जो सभ्यता के पॉलिश किए हुए जूतों के नीचे दबी हुई एक चीख है, जिसे मैं ड्राइंग रूम की औपचारिक चाय पीते हुए कंठ में ही निगल लेता हूँ। वही सच... अब कोरे कागज़ पर स्याही की बूंद बनकर गिरता है। अब वह शब्द नहीं रहा, मेरी आत्मा की 'अनूदित'भाषा है। क्योंकि जो मैं नहीं कह सकता, उसे मेरी कविता— बिना किसी छंद के बोझ के, बिलकुल नग्न होकर, सरेआम कह देती है। *Adv. आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
The Path of Self-Respect Where merit has no value, and only wealth’s echo rings, To stay in such a world, a heavy burden brings. When faith becomes a jewel, worn only by the elite, How can a common soul find a place to retreat? The gifted stand in silence, for their pockets hold no gold, In a world that prizes riches, and leaves the wise out in the cold. Where humanity must bow down at the feet of luxury's pride, It’s better to forsake that path, where truth is cast aside. I leave behind the shadows of a biased, hollow grace, For every gathering feels empty in a loveless, heartless place. Ashish says, "O seeker, rise! Let your dignity be known, To stay where you aren't valued is a defeat you shouldn't own." The steps toward transformation shall never now retreat, In search of my own essence, I find my soul complete. Adv. Ashish Jain Firozabad
*धूल का अभिमान* मुट्ठी भर चांदी की खातिर, ईमान बेचते देखा है, चार पैसे क्या कमाए, खुद को भगवान समझते देखा है। भूल गए वो अपनी हस्ती, भूल गए इंसानी नाता, पैसे के इस घमंड में, अब कोई नजर नहीं आता। आशीष कहे, ये दुनिया अब झूठी शान में जीती है, अहंकार के प्याले से ये, हर पल जहर ही पीती है। धर्म सिखाता प्रेम की भाषा, धर्म तो बड़ा महान है, पर समाज की ये घटिया सोच, करती उसे लहूलुहान है। जहाँ कद्र नहीं इंसान की, बस दौलत की पूजा होती है, ऐसे खोखले रिश्तों में, इंसानियत ही तो रोती है। बेकार है ऐसा ढांचा, घटिया ये रीत पुरानी है, जहाँ सच की कोई जगह नहीं, बस झूठ की ही कहानी है। इस सड़े हुए समाज को, छोड़ देना ही सबसे बढ़िया है, जहाँ स्वाभिमान की बलि चढ़े, वो राह बड़ी ही घटिया है। आशीष, अपनी राह बनाओ, छोड़ो ये झूठा मेला, सच के पथ पर चलने वाला, भला होता है अकेला। *Adv.आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
*आत्म-सम्मान की राह* जहाँ गुणों की मोल नहीं, बस धन की ही झंकार है, उस समाज में रहना अब, मन को बड़ा भार है। धर्म बना जब आभूषण, केवल धनी वर्ग की शान का, तब अर्थ क्या रह जाता है, निर्धन के आत्म-सम्मान का? गुणी खड़ा है मौन कहीं, क्योंकि उसकी जेब खाली है, दिखावे की इस दुनिया ने, बस दौलत ही पाली है। जिस चौखट पर इंसानियत, रईसी के आगे झुकती हो, बेहतर है वह राह तजें, जहाँ सत्य की साँसें रुकती हो। छोड़ चला मैं वह साया, जो भेदभाव की धूनी है, बिना कद्र के हर महफिल, लगती बिलकुल सूनी है। आशिष कहता, उठो पथिक, अपनी गरिमा को पहचानो, जहाँ कद्र नहीं वहाँ रुकना ही, सबसे बड़ी हार मानो। परिवर्तन की ओर बढ़े कदम, अब पीछे नहीं हटेंगे, स्वयं की खोज में निकले हैं, अब सच से नहीं बटेंगे। *adv. आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
*तेज का पुंज: दिवाकर* नभ में चमके भानु, दिवाकर, तम को हरे प्रभाकर, दिनकर। उदय होत जब सूर्य सुनहरे, किरणें बिखेरें मार्तंड गहरे। रवि की आभा, तरणि का प्रकाश,आदित्य सजाते नीला आकाश।पतंग उड़े ज्योत की डोरी संग,सविता भरते जग में नव रंग। अर्क रूप में जल को पाते,सहस्रांशु जग को चमकाते।आशीष मिले जब अंशुमाली का, अंत हो जग की हर काली रात का। *Adv. आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
*आधुनिक कुरुक्षेत्र* आज भी जीवित है वह रण, वह युद्ध पुराना, हर युग में पड़ता है संग्राम को दोहराना। भीतर के विग्रह में जब विवेक सो जाता है, तब हर महाभारत में एक 'धृतराष्ट्र' जन्म पाता है। वह नृप, वह नरेश, वह महीपति अंधा, मोह के पाश में जिसका हर संकल्प है बंधा। सत्य की ज्योति, लौ और शिखा को नमन कर, खड़ा है 'आशीष' आज अपनी लेखनी को धनुष कर। न्याय की राह, डगर और पथ जब धुंधला जाए, अंधा स्वार्थ ही तब विनाश और प्रलय लाए। पर याद रहे, जहाँ धर्म, नीति और पुण्य का वास है, वहीं विजय का असली अंश, भाग और प्रकाश है। *Adv. आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
*प्रतिमा नहीं, स्वभाव है धर्म* समाज की मिट्टी से ही, धर्म का स्तंभ खड़ा होता है, पर जब समाज हो धर्म-विमुख, तो सच कहीं बड़ा होता है। बिना समाज के धर्म भला, किस काम का रह जाएगा? पर खोखले समाज में धर्म, बस नाम का रह जाएगा। बातों के ज्ञानी बहुत मिले,पर कर्मों में सब मौन हैं।ढोंग की चादर ओढ़े सब,बताओ यहाँ धार्मिक कौन है? मंदिर के उस सन्नाटे में, तुम जिसे खोजने जाते हो, कंकड़ और पत्थरों में, बस अक्स अपना पाते हो। धर्म न तिलक की लंबाई में, न जप की माला में है, धर्म न ऊँचे नारों में, न पीत-वस्त्र की शाला में है। असली धर्म तो जीवित है, मानव के सहज स्वभाव में, दया की शीतल वाणी में, और प्रेम के सद्भाव में। पर अंधी इस दुनिया को, बस मूरत ही दिख पाती है, भीतर की जो करुणा है, वह बिन देखे मर जाती है। प्रतिमा पूजी, पर इंसान को, पैरों तले कुचला गया, धर्म के नाम पर सदियों से, बस दिखावा ही रचा गया। जिस दिन स्वभाव में सत्य बढ़ा, उस दिन ये जग मुस्काएगा, पत्थर में नहीं, तब मानव में, ईश्वर तुम्हें मिल जाएगा। *Adv.आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
*स्वभाव का रंग* चाहे डुबो दो मिश्री में, या चाशनी का दो साथ, नींबू अपनी खटास न छोड़े, कैसी भी हो बात। महीने दो या बीतें आठ, रंग न उसका बदलेगा, मीठे जल के भीतर भी, वह खट्टा ही निकलेगा। इंसान का भी यही है ढंग,भीतर छुपा है असली रंग। दिखावे की दुनिया में, चाहे ओढ़ लो कितने भेष, मिटता नहीं है सहज भाव, रह जाता है कुछ अवशेष। जब तक जीवन की भट्टी में, व्यक्तित्व नहीं तपाया जाता, जब तक कर्मों के उपयोग में, खुद को नहीं लाया जाता— तब तक ऊपर की परतें, बस भ्रम का जाल बिछाती हैं, पर असली स्वाद की गहराई, अंत में रंग दिखाती हैं। परिवर्तन बस बाहर से, अक्सर धोखा होता है, भीतर का जो बीज है भाई, वही फल को बोता है। स्वभाव बदलना सहज नहीं, यह अंतर्मन की धारा है, *Adv.आशीष जैन* *7055301422* *फिरोजाबाद*
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