*अनकहा सच*
पॉकेट में पड़े कुछ सिक्कों की खनक-सा
नहीं है मेरा सच,
न ही वह किसी बड़े मंच पर दिया गया
कोई सधा हुआ भाषण है।
मेरा सच तो उस 'खालीपन' में है
जो भीड़ से घर लौटते समय
बस की खिड़की के बाहर दिखता है।
वह सच,
जो सभ्यता के पॉलिश किए हुए जूतों के नीचे
दबी हुई एक चीख है,
जिसे मैं ड्राइंग रूम की औपचारिक चाय पीते हुए
कंठ में ही निगल लेता हूँ।
वही सच...
अब कोरे कागज़ पर
स्याही की बूंद बनकर गिरता है।
अब वह शब्द नहीं रहा,
मेरी आत्मा की 'अनूदित'भाषा है।
क्योंकि जो मैं नहीं कह सकता,
उसे मेरी कविता—
बिना किसी छंद के बोझ के,
बिलकुल नग्न होकर,
सरेआम कह देती है।
*Adv. आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*