*आधुनिक कुरुक्षेत्र*
आज भी जीवित है वह रण, वह युद्ध पुराना,
हर युग में पड़ता है संग्राम को दोहराना।
भीतर के विग्रह में जब विवेक सो जाता है,
तब हर महाभारत में एक 'धृतराष्ट्र' जन्म पाता है।
वह नृप, वह नरेश, वह महीपति अंधा,
मोह के पाश में जिसका हर संकल्प है बंधा।
सत्य की ज्योति, लौ और शिखा को नमन कर,
खड़ा है 'आशीष' आज अपनी लेखनी को धनुष कर।
न्याय की राह, डगर और पथ जब धुंधला जाए,
अंधा स्वार्थ ही तब विनाश और प्रलय लाए।
पर याद रहे, जहाँ धर्म, नीति और पुण्य का वास है,
वहीं विजय का असली अंश, भाग और प्रकाश है।
*Adv. आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*