*प्रतिमा नहीं, स्वभाव है धर्म*
समाज की मिट्टी से ही, धर्म का स्तंभ खड़ा होता है,
पर जब समाज हो धर्म-विमुख, तो सच कहीं बड़ा होता है।
बिना समाज के धर्म भला, किस काम का रह जाएगा?
पर खोखले समाज में धर्म, बस नाम का रह जाएगा।
बातों के ज्ञानी बहुत मिले,पर कर्मों में सब मौन हैं।ढोंग की चादर ओढ़े सब,बताओ यहाँ धार्मिक कौन है?
मंदिर के उस सन्नाटे में, तुम जिसे खोजने जाते हो,
कंकड़ और पत्थरों में, बस अक्स अपना पाते हो।
धर्म न तिलक की लंबाई में, न जप की माला में है,
धर्म न ऊँचे नारों में, न पीत-वस्त्र की शाला में है।
असली धर्म तो जीवित है, मानव के सहज स्वभाव में,
दया की शीतल वाणी में, और प्रेम के सद्भाव में।
पर अंधी इस दुनिया को, बस मूरत ही दिख पाती है,
भीतर की जो करुणा है, वह बिन देखे मर जाती है।
प्रतिमा पूजी, पर इंसान को, पैरों तले कुचला गया,
धर्म के नाम पर सदियों से, बस दिखावा ही रचा गया।
जिस दिन स्वभाव में सत्य बढ़ा, उस दिन ये जग मुस्काएगा,
पत्थर में नहीं, तब मानव में, ईश्वर तुम्हें मिल जाएगा।
*Adv.आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*