जीवन: एक अधजला पत्र
वक़्त की दहकती भट्टी से
अभी-अभी झपट कर निकाला गया है इसे,
देखो, इसके किनारे अभी भी सियाह हैं,
और उनसे सोंधी-सी गंध आ रही है—
झूठ के जलने और सच के झुलसने की।
यह जीवन...
विधाता के दफ़्तर से निकला
एक 'अधजला पत्र' ही तो है।
पूरा मजमून (विषय) तो कोई पढ़ ही नहीं पाया,
कुछ शब्द 'बचपन' की आग में स्वाहा हुए,
कुछ 'जवानी' की बेबाक लपटों ने चाट लिए,
अब जो बचा है,
उसे 'बुढ़ापा' अपनी धुंधली आँखों से
पढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
सफेद हिस्सों पर इबारत कम है,
काली राख के निशान ज़्यादा हैं,
ये निशान गवाह हैं—
उन ख़्वाहिशों के, जो अधूरी रह गईं,
उन वादों के, जो बीच में ही टूट गए,
और उस प्रेम के, जो मुकम्मल होने से पहले ही
असमय 'इतिहास' हो गया।
अजीब कशमकश है...
इस अधजले पत्र को न फेंका जा सकता है,
न ही सीने से लगाकर मुकम्मल जिया जा सकता है।
बस, सहेज कर रखा है इसे
साँसों की अलमारी में,
इस उम्मीद में कि शायद...
शायद बची हुई कोरी जगह पर
अभी कुछ नया, कुछ सार्थक लिखना बाकी है।
पर सच तो यही है,
हम सब ढो रहे हैं
अपने-अपने हिस्से का—
एक 'अधजला पत्र'।
Adv. आशीष जैन
7055301422
फिरोजाबाद