*स्वभाव का रंग*
चाहे डुबो दो मिश्री में, या चाशनी का दो साथ,
नींबू अपनी खटास न छोड़े, कैसी भी हो बात।
महीने दो या बीतें आठ, रंग न उसका बदलेगा,
मीठे जल के भीतर भी, वह खट्टा ही निकलेगा।
इंसान का भी यही है ढंग,भीतर छुपा है असली रंग।
दिखावे की दुनिया में, चाहे ओढ़ लो कितने भेष,
मिटता नहीं है सहज भाव, रह जाता है कुछ अवशेष।
जब तक जीवन की भट्टी में, व्यक्तित्व नहीं तपाया जाता,
जब तक कर्मों के उपयोग में, खुद को नहीं लाया जाता—
तब तक ऊपर की परतें, बस भ्रम का जाल बिछाती हैं,
पर असली स्वाद की गहराई, अंत में रंग दिखाती हैं।
परिवर्तन बस बाहर से, अक्सर धोखा होता है,
भीतर का जो बीज है भाई, वही फल को बोता है।
स्वभाव बदलना सहज नहीं, यह अंतर्मन की धारा है,
*Adv.आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*