*धूल का अभिमान*
मुट्ठी भर चांदी की खातिर, ईमान बेचते देखा है,
चार पैसे क्या कमाए, खुद को भगवान समझते देखा है।
भूल गए वो अपनी हस्ती, भूल गए इंसानी नाता,
पैसे के इस घमंड में, अब कोई नजर नहीं आता।
आशीष कहे, ये दुनिया अब झूठी शान में जीती है,
अहंकार के प्याले से ये, हर पल जहर ही पीती है।
धर्म सिखाता प्रेम की भाषा, धर्म तो बड़ा महान है,
पर समाज की ये घटिया सोच, करती उसे लहूलुहान है।
जहाँ कद्र नहीं इंसान की, बस दौलत की पूजा होती है,
ऐसे खोखले रिश्तों में, इंसानियत ही तो रोती है।
बेकार है ऐसा ढांचा, घटिया ये रीत पुरानी है,
जहाँ सच की कोई जगह नहीं, बस झूठ की ही कहानी है।
इस सड़े हुए समाज को, छोड़ देना ही सबसे बढ़िया है,
जहाँ स्वाभिमान की बलि चढ़े, वो राह बड़ी ही घटिया है।
आशीष, अपनी राह बनाओ, छोड़ो ये झूठा मेला,
सच के पथ पर चलने वाला, भला होता है अकेला।
*Adv.आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*