*तेज का पुंज: दिवाकर*
नभ में चमके भानु, दिवाकर,
तम को हरे प्रभाकर, दिनकर।
उदय होत जब सूर्य सुनहरे,
किरणें बिखेरें मार्तंड गहरे।
रवि की आभा, तरणि का प्रकाश,आदित्य सजाते नीला आकाश।पतंग उड़े ज्योत की डोरी संग,सविता भरते जग में नव रंग।
अर्क रूप में जल को पाते,सहस्रांशु जग को चमकाते।आशीष मिले जब अंशुमाली का,
अंत हो जग की हर काली रात का।
*Adv. आशीष जैन*
*7055301422*
*फिरोजाबाद*